मंडल के खिलाफ उठी प्रतिक्रांति की पूर्णता का प्रतीक है राम मंदिर पर ध्वजारोहण  

यदि यह जानने का प्रयास हो कि आधुनिक भारत में 25 नवम्बर खास तौर से किस लिए याद किया जाता है तो गूगल सहित सबका जवाब होगा : ‘संविधान निर्माण पर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के समापन भाषण के लिए !’  26 नवम्बर, 1949 को राष्ट्र को संविधान सौंपने के एक दिन पूर्व, डॉ. आंबेडकर ने 25 नवम्बर को संसद के केन्द्रीय कक्ष से एक ऐतिहासिक संबोधन किया था। उस दिन 26 जनवरी, 1950 से लागू होने वाले स्वाधीन भारत के संविधान पर कभी न भूलने वाला भाषण दिया था, जिसमें  संविधान की महत्ता बताते हुए एवं राष्ट्र को चेतावनी देते हुए कहा था,’ 26 जनवरी, 1950 से हम एक विपरीत जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। हमें राजनीति के क्षेत्र में समानता मिलेगी, किन्तु सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में मिलेगी भीषण असमानता।

यदि हम निकट भविष्य में सामाजिक और आर्थिक विषमता से पार न हो पाए तो विषमता से पीड़ित जनता लोकतंत्र के उस ढांचे को विस्फोटित कर सकती है, जिसे संविधान निर्मात्री सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है!’ संविधान निर्माता की उस चेतावनी के बाद तमाम लोकतंत्र प्रेमी उनके ऐतिहासिक भाषण से प्रेरणा लेने के लिए 25 नवम्बर को सभा-संगोष्ठियां आयोजित करते रहे हैं। 2025 में भी इसका अपवाद नहीं हुआ! 2025 के 25 नवम्बर को बाबा साहेब की ऐतिहासिक चेतावनी को स्मरण करने के लिए हजारों संगठन विभिन्न जगहों पर सभा-संगोष्ठी किये।

लेकिन इस बार जिस समय पूरे देश में संविधान पर चर्चा का दौर चल रहा था, उसी समय हिन्दुत्ववादियों की ओर से आंबेडकर से जुड़े इस ऐतिहासिक दिवस पर वैसा ही बड़ा उपक्रम चलाया गया, जैसे 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वस्त कर डॉ. आंबेडकर परिनिर्वाण दिवस के रूप में चिन्हित 6 दिसंबर को एक अलग पहचान देने का प्रयास हुआ था। बहरहाल 5 अगस्त, 2020 को राम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखने और 22 जनवरी, 2024 को उसका उद्घाटन करने के बाद जब 25 नवम्बर, 2025 को उसकी पूर्णता के प्रतीक स्वरूप, 18 फीट लम्बे और 9 फीट ऊँचे धर्म ध्वज को फहराने के लिए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी राम नगरी पहुंचे, सड़कों के दोनों किनारे लाखों की तादाद में उपस्थित राम भक्तों ने उनका स्वागत पुष्प-वर्षा करके किया!

 साधु-संतों के हर्षोल्लास के मध्य मोदी ने किया राम मंदिर पर ध्वजारोहण 

खैर! लाखों लोगों के जयघोष के मध्य रोड शो करते हुए जब प्रधानमंत्री भव्यता के पर्याय के रूप में प्रतिष्ठित राम मंदिर के प्रांगण में पहुंचे, उन्हें धर्म ध्वजा फहराने के शुभ मुहूर्त के लिए बीस मिनट प्रतीक्षा करनी पड़ी। इस दरम्यान वह गर्भगृह में कार्यदायी संस्था के इंजीनियरों व इससे जुड़े अन्य अधिकारियों से बात करते रहे।  फिर ग्रीन हाउस गए। फिर चंद मिनट में ही वापस आकर राम दरबार व रामलला के सामने नतमस्तक हुए। हाथ में अक्षत पुष्प लेकर पूजा की। इस समय लगभग 11 बजकर, 27 मिनट हो चुके थे। इसके बाद 11 बजकर, 47 मिनट पर प्रारंभ हो रहे अभिजित मुहूर्त शुरू होते ही ध्वजारोहण के लिए तैयार किये गए मंच पर आए।  

साथ में संघ प्रमुख मोहन भागवत मौजूद रहे। मंच पर उन्होंने शिखर की ओर देखा और फिर मैकेनिकल तरीके से सज्जित की गई घिर्री घुमा कर ध्वजारोहण किया और  मात्र चार मिनट में मोटराइज्ड पुलिंग सिस्टम से धर्म ध्वजा शिखर पर पहुँच गया। ध्वजारोहण के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने 32 मिनट के संबोधन में सामाजिक समरसता और सहभागिता का भान कराते हुए कहा कि आज सदियों लम्बे एक ऐसे यज्ञ की पूर्णाहुति हुई, जिसकी पवित्र अग्नि 500 वर्षों तक प्रज्ज्वलित रही है। धर्म ध्वजा भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण ध्वज है। इसका भगवा रंग, ॐ शब्द और कोविदार वृक्ष रामराज्य की कृति को प्रतिरूपित करता है। यह ध्वज….संघर्ष से सृजन की गाथा है, सदियों से चले आ रहे स्वपनों का साकार स्वरूप है।

उन्होंने कहा कि हमने सहभागिता की भावना से पिछले ग्यारह वर्षों में महिला, दलित, पिछड़े, अति पिछडे, आदिवासी, वंचित किसान, श्रमिक, युवा हर वर्ग को विकास के केंद्र में रखा ही। सबके प्रयास से 2047 में जब देश आजादी के 100 साल मनायेगा, तब तक हमें विकसित भारत का निर्माण करना होगा। भारत में प्रत्येक घर में और प्रत्येक भारतीय में राम हैं। गुलामी की मानसिकता इतनी हावी हो गई है कि प्रभु राम को भी काल्पनिक घोषित किया जाने लगा है। हम ठान लें तो मानसिक गुलामी से मुक्ति पा लेंगे। इस क्रम में उन्होंने अगले दस वर्षों में मैकाले की शिक्षा पद्धति से उपजी मानसिकता के समूल नाश का आह्वान किया। उन्होंने याद दिलाया कि मैकाले ने भारतीय समाज को उसकी समृद्ध सांस्कृतिक चेतना से विमुख करने के लिए जिस शिक्षा पद्धति का सूत्रपात किया, उसने हमें गुलामी की मानसिकता में धकेल दिया। 

आज जब राम मंदिर पर धर्म ध्वजा के मध्यम से देश अपनी सांस्कृतिक चेतना के एक और उत्कर्ष बिन्दु का साक्षी बन रहा है, तो इस अवसर पर हमें इस मानसिकता के खात्मे का संकल्प भी लेना होगा। 10 वर्ष बाद मैकाले की शिक्षा पद्धति के 200 साल पूरे हो जायेंगे। तब तक हमें इस मानसिकता से पूरी तरह मुक्ति पा लेनी होगी। मोदी ने देश में रामत्व को नकारे जाने को भी गुलाम मानसिकता का एक और उदाहरण बताते हुए कहा कि यदि हम ठान लें तो 10 वर्ष में इस मानसिकता से मुक्ति पाना कठिन नहीं है। इसके बाद एक ऐसी ज्वाला प्रज्ज्वलित होगी जो हमें आत्मविश्वास और राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत कर 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ने का मार्ग दिखाएगी ! कुल मिलाकर राम मंदिर निर्माण के पूर्णता स्वरूप धर्म ध्वजा फहराने के क्रम में दस वर्ष में मैकाले की मानसिकता से मुक्ति और  2047 तक विकसित भारत बनाने में योगदान करने का लक्ष्य देश के सामने रख दिया!

क्या 500 वर्षों के निरंतर संघर्ष का परिणाम है: राम मंदिर !    

बहरहाल 25 नवम्बर को राम मंदिर पर धर्म ध्वजा फहराया जाना भाजपा और खासकर उसके नेता नरेंद्र मोदी की बड़ी उपलब्धि है, जिसे इतिहास कभी भूलेगा नहीं। राम मंदिर निर्माण मोदी के बड़े संकल्पों में एक था, जिसे उन्होंने पूरा कर दिखाया। इस ऐतिहासिक अवसर पर उन्होंने जो कुछ कहा, वही संघ प्रमुख मोहन भागवत, योगी आदित्यनाथ इत्यादि सहित भाजपा के सभी छोटे-बड़े नेताओं ने दोहराया। लेकिन सबके उद्गार में जो सबसे बड़ी साम्यता रही, वह यह कि 500 वर्षों के निरंतर संघर्ष का परिणाम है वर्तमान राम मंदिर! राम मंदिर 500 वर्षों के निरंतर संघर्ष का परिणाम है, यह बात मोदी- योगी सहित इस ऐतिहासिक अवसर पर अपना उद्गार व्यक्त करने वाले तमाम शख्सियतों ने दोहराया।

सबने यह संदेश देने का प्रयास किया कि यह वह स्थान है, जिसे लेकर 500 वर्षों तक संघर्ष चला, जिसमें असंख्य सन्यासी, संत, पुजारी, नागा, निहंग, राजनेता, चिन्तक, विद्वानों ने योगदान किया: प्राणों की आहुति दिया! योगी आदित्यनाथ के शब्दों में यह अवसर उन संतों, योद्धाओं, रामभक्तों के अखंड साधना-संघर्ष को समर्पित है, जिन्होंने आन्दोलन के लिए जीवन को समर्पित किया। लेकिन क्या सचमुच राम मंदिर के लिए 500 सालों तक अनवरत संघर्ष चला है?

राम मंदिर के इतिहास को लेकर विगत वर्षों में जो कुछ लिखा गया है, उससे पता चलता है कि 25 सितंबर, 1990 को राम जन्मभूमि मुक्ति के लिए भाजपा के लाल कृष्ण आडवाणी ने जो रथ यात्रा निकाली, वहाँ से राम मंदिर निर्माण के अनवरत संघर्ष का सिलसिला शुरू होता है। इसके पहले राम मंदिर निर्माण आंदोलन में हिन्दू समाज की व्यापक भागीदारी नहीं रही: इसके लिए कुछ साधु – संत  ही छिटपुट आंदोलन चलाते रहे।  

हाल के वर्षों में विभिन्न विद्वानों ने इसके इतिहास का संधान करते हुए जो लेखन किया है, उससे पता चलता है कि मुगल सम्राट बाबर ने मस्जिद का निर्माण 1528 करवाया था। अवध के नवाब वाजिद शाह के हुकूमत के दौरान निर्मोही नामक के एक हिन्दू संप्रदाय ने दावा किया कि मस्जिद के लिए रास्ता बनाने के लिए बाबर युग में एक हिन्दू मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया था। अयोध्या में बाबरी मस्जिद स्थल पर धार्मिक विवाद पहली बार 1853 मे हुआ।

इसके छह साल बाद अंग्रेजों ने साइट को दो हिस्सों मे बांटने के लिए बाड़ लगा दिया। मुसलमानों को मस्जिद के भीतर प्रार्थना करने की अनुमति दी गई, जबकि बाहरी परिसर को हिंदुओं को दे दिया गया। जनवरी, 1885 में महंत रघुवीर दास ने फैजाबाद जिला अदालत में एक अनुरोध प्रस्तुत किया, जिसमें मस्जिद के बाहर स्थित एक ऊंचे मंच राम चबूतरा पर एक छतरी के निर्माण की मंजूरी मांगी गई। हालांकि याचिका खारिज कर दी गई। फिर एक लंबे अंतराल बाद इससे जुड़ी घटना 23 दिसंबर, 1949 को सामने आई जब बाबरी मस्जिद के अंदर रामलला की मूर्ति प्रकट हुई।

उसके बाद गोपाल सिंह विशारद नामक व्यक्ति ने वहाँ पूजा करने के लिए फैजाबाद अदालत में याचिका दायर की। इसके खिलाफ अयोध्या निवासी हाशिम अंसारी नामक व्यक्ति ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और कहा कि मूर्ति को हटा दिया जाना चाहिए और इसे मस्जिद ही रहने दिया जाना चाहिए। सरकार ने उस स्थान पर ताला लगा दिया, लेकिन हिंदुओं को बाहर से रामलला की पूजा करने की अनुमति दे दिया। 

कोर्ट के सौजन्य से मिला: राम मंदिर निर्माण की अनुमति 

यहाँ से मुकदमों का सिलसिला शुरू हुआ। हिन्दू पक्ष से दिगम्बर अखाड़ा के प्रतिनिधियों ने 1950 में और इसके बाद निर्मोही अखाड़ा ने 1959 में अदालत का दरवाजा खटखटाया। 1961 में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने मस्जिद और उसके आस-पास के कब्रिस्तान पर दावा किया। फिर जुलाई 1989 में, रामलला विराजमान ने जस्टिस अग्रवाल के माध्यम से खुद अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां उन्होंने मस्जिद को हटाने और विवादित जमीन वापस मांगी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से रामलला के दावे को आंशिक रूप से स्वीकार करने और उन्हें निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को 2.77 एकड़ जमीन का एक तिहाई हिस्सा देने से पहले कई साल बीत गए। अंत में 9 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व में पाँच न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चन्द्रचूंड, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल थे, ने 2.77 एकड़ की विवादित जमीन को एक ट्रस्ट को ट्रांसफर करने का आदेश दिया।

इस ट्रस्ट को राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण के लिए भारत सरकार द्वारा स्थापित किया जाना था। इसके अतिरिक्त, अदालत ने सरकार को मस्जिद के निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को एक अलग स्थान पर वैकल्पिक पाँच एकड़ जमीन आवंटित करने का निर्देश दिया। आदेश जारी करने वाले पाँच जजों की बेंच का नेतृत्व करने वाले मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को 2020 में मोदी सरकार की ओर से राज्य सभा में नामित किया गया। उस समय सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस एके पटनायक, जस्टिस कुरियन ने जोसेफ और जस्टिस जे चेलमेश्वर ने उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाते कहा था कि इसने आम लोगों के विश्वास को हिला दिया है। 9 नवंबर, 2019 को राम मंदिर पर फैसला देने वाले गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत हो गए।

जस्टिस गोगोई की भूमिका देखते हुए मानना पड़ता है मंदिर निर्माण का मार्ग संघर्ष नहीं, दूसरे तरीके से प्रशस्त हुआ। राम मंदिर निर्माण के बनाए गए ट्रस्ट का नाम ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ रखा गया, जिसमें 15 सदस्य शामिल हैं। बहरहाल 5 अगस्त, 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखी। उस दिन उन्होंने एक पट्टिका का अनावरण करने के साथ एक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया। इसे इतिहास का अद्भुत संयोग कहा जाएगा कि राम मंदिर निर्माण का शिलान्यास करने वाले प्रधानमंत्री मोदी को ही बाद में इतिहास ने 22 जनवरी, 2024 को इसकी प्राण प्रतिष्ठा करने और फिर 25 नवम्बर, 2025 को इसकी पूर्णता के प्रतीक स्वरूप ध्वजारोहण का भी गौरव प्रदान किया।

1989 में मंदिर आन्दोलन से जुड़ी: भाजपा   

जिस राम मंदिर निर्माण में प्रधानमंत्री मोदी को ऐतिहासिक रोल अदा करने का अवसर मिला, उसके आंदोलन में उनकी पार्टी की एंट्री 1989 में हुए हिमाचल के पालमपुर सम्मेलन से हुई, जहां भाजपा ने घोषणा किया कि वह राम मंदिर आंदोलन में शामिल हो रही है। तब पार्टी की ओर से कहा गया था अदालतें विश्वास का मामला तय नहीं कर सकतीं। उसके बाद राम मंदिर का मुद्दा भाजपा के घोषणापत्र का अहम हिस्सा बन गया। इससे पहले 1964 में स्थापित आरएसएस की एक और शाखा विश्व हिन्दू परिषद इसकी अगुवाई कर रही थी, जिसके एजेंडे में 1980 में ही राम मंदिर आ गया था।

जनवरी, 1984 मे भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस प्रमुख बाला साहब देवरस ने प्रयागराज माघ मेले मे एक संघ शिविर में उपस्थित लोगों से पूछा था,’ राम जन्मभूमि कब तक बंद रहेगी? उसके तीन महीने बाद, दिल्ली में आयोजित एक धर्म संसद में भाग लेने वाले संतों ने राम जन्मभूमि मुक्ति का मुद्दा उठाया। उसी वर्ष राम जन्मभूमि यज्ञ मुक्ति समिति का भी गठन किया गया और अयोध्या से लखनऊ तक की उनकी धर्म यात्रा ने उत्तर भारत, महाराष्ट्र और गुजरात के हिंदुओं की सामूहिक चेतना में मंदिर के मुद्दे को आगे बढ़ाया। लेकिन विहिप के सौजन्य से राम मंदिर का जो मुद्दा गरमाया, उसके सद्व्यवहार के लिए भाजपा 25 सितंबर, 1990 को दीन दयाल उपाध्याय के जयंती के दिन मैदान में तब कूदी, जब मण्डल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद देश में एक अलग किस्म का माहौल बन गया था।

उस दिन लाल कृष्ण आडवाणी ने यह कहकर कि मण्डल से समाज बंट रहा है, गुलामी के सबसे बड़े प्रतीक राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा शुरू कर दिया, जिसके बाद देश में राम मंदिर के लिए जनोंन्माद शुरू हो गया।लेकिन इस जनोन्माद के पीछे राम के प्रति श्रद्धा कम दलित-आदिवासी और पिछड़ों के आरक्षण के खात्मे की भावना की क्रियाशीलता बहुत ज्यादा रही। और हिन्दू समाज के अग्रसर समुदायों की आरक्षण के खात्मे के लिए उमड़ी भावना का सदुपयोग करने में भाजपा इसलिए देर नहीं लगाई क्योंकि उसका पितृ संगठन आरएसएस पूना पैक्ट के जमाने से ही इसके खात्मे की ताक में था।

हिन्दू आरक्षण के प्रतिकार के लिए: वजूद में आया आंबेडकरी आरक्षण! 

स्मरण रहे जो भाजपा आज खुद को हिन्दू धर्म के ठेकेदार के रूप में स्थापित कर ली है, सदियों से उस हिन्दू धर्म का प्राण, उस वर्ण-व्यवस्था में स्पंदित होता रहा है जो मुख्यतः शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था रही है। जिसे हिन्दू धर्म कहा जाता है, दरअसल वह वर्ण– धर्म है जिसमें प्रत्येक वर्ण के लिए पेशे/कर्म निर्दिष्ट रहे।   ब्राह्मणों का पेशा/कर्म अध्ययन- अध्यापन, राज्य – संचालन में मंत्रणा दान ; क्षत्रिय का राज्य और सैन्य संचालन के साथ भूस्वामित्व और वैश्यों का पेशा पशु-पालन व व्यवसाय- वाणिज्य रहा। इसमें स्व-धर्म पालन के लिए कर्म- शुद्धता की अनिवार्यता और कर्म-संकरता की निषेधाज्ञा के फलस्वरूप वर्ण – व्यवस्था ने एक आरक्षण- व्यवस्था : हिन्दू- आरक्षण का रूप अख्तियार कर लिया। पेशे /कर्मों की विचलनशीलता की निषेधाज्ञा के कारण हिन्दू आरक्षण में चिरकाल के लिए शक्ति के समस्त तीन उच्च वर्णों के लिए आरक्षित हो गए।

हिन्दू आरक्षण में शुद्रातिशूद्रों  के हिस्से में आई सिर्फ तीन उच्च वर्णों की सेवा, वह भी पारश्रमिक रहित। इनके लिए अर्थीपार्जन, शिक्षार्जन सहित राजनीतिक गतिविधियां अधर्म व दंडनीय अपराध रहीं। मंदिरों का पुजारी बनना तो दूर इनके लिए अपने लौकिक और पारलौकिक सुख के लिए पूजा-पाठ तक अधर्म घोषित रहा। ये तीन उच्च वर्णों की पारिश्रमिक रहित सेवा में मोक्ष का संधान करने के लिए अभिशप्त रहे। हिन्दू धर्म शास्त्रों द्वारा सुपरिकल्पित रूप से चिरकाल के लिए शक्ति के समस्त स्रोतों (आर्थिक- राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक) से बहिष्कार के कारण शुद्रातिशूद्र दैविक- सर्वस्वहारा बनने के लिए अभिशप्त हुए।

उनकी स्थिति हिन्दू धर्म के गुलामों के रूप में रही। इनमें दलितों की स्थिति गुलामों के गुलाम के रूप में रही। वे शक्ति के समस्त स्रोतों से तो बहिष्कृत रहे ही, उन्हें अच्छा नाम रखने और मंदिरों में घुसकर ईश्वर के समक्ष अपने दुःख-मोचन के लिए प्रार्थना करने तक का अवसर नहीं रहा। हिन्दू समाज के इन्हीं गुलामों के गुलामों की मुक्ति का संकल्प बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने लिया और उन्हें आरक्षण के जरिए शक्ति के स्रोतों में काफी हद तक हिस्सेदारी दिलाने में सफल हुए।

राम मंदिर आन्दोलन: आरक्षण के विस्तार के खिलाफ उठी एक प्रतिक्रांति  

आंबेडकरी आरक्षण से दलित – आदिवासी उन पेशों /कर्मों को अपनाने के अधिकारी बन गए, जो हिन्दू धर्मशास्त्रों द्वारा सिर्फ ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्यों के लिए निर्दिष्ट रहे। इस अधिकार के फलस्वरूप वे सांसद- विधायक, डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, बाबू, मैनेजर इत्यादि बनने लगे। संघ परिवार के लिए यह असहनीय था, क्योंकि इससे हिन्दू धर्म-शास्त्र और ईश्वर भ्रांत लगने लगे। ऐसे में संघ बराबर आरक्षण के खात्मे के अवसर की तलाश में रहा। और जब 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई, उसे यह अवसर मिल गया। मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होते ही दलित, आदिवासी, पिछड़े व इनसे धर्मान्तरित तबके भ्रातृ- भाव लिए एक दूसरे के करीब आने लगे और उनके शासक वर्ग में उभरने के लक्षण दिखने लगे।

सबसे बड़ी बात हुई कि मंडल रिपोर्ट से आरक्षण का विस्तार हो गया। तब मंडलवादी आरक्षण के खिलाफ हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगी वर्ग के सभी तबके: छात्र और उनके अभिभावक, साधु-संत, मीडिया कर्मी, लेखक इत्यादि लामबंद होकर आन्दोलन चलाने लगे। यह आन्दोलन मंडल की क्रांति के खिलाफ एक प्रतिक्रांति थी। आरक्षण के खिलाफ एक प्रतिक्रान्ति के रूप में उमड़ी हिन्दू समाज के उच्च- वर्ण तबके की भावना को आडवाणी ने अपनी रथ- यात्रा के जरिए गुलामी के सबसे बड़े प्रतीक राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन से जोड़ दिया। भाजपा के मंदिर अभियान से जो जनोंन्माद उमड़ा, वह मुख्यतः आरक्षण के खात्मे से प्रेरित था।

दुर्भाग्य से राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन नामक प्रतिक्रांति में अज्ञानतावश भारी संख्या में पिछड़े भी शामिल हो गए, जिनके जीवन में क्रांतिकारी  परिवर्तन लाने के मकसद से मंडलवादी आरक्षण की घोषणा हुई थी। संघ परिवार ने बाबर की संतानों के प्रति वंचित जातियों में वर्षों से संचित अपार नफरत और हिन्दू धर्मशास्त्रों द्वारा इनके रग-रग में फैलाई गई दैवीय- गुलामी का जमकर सद्व्यवहार किया। 

प्रतिक्रांति का इल्म होने पर क्रांति के लिए मन बना सकते हैं:  दैवीय- गुलाम बहुजन!  

राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन के सहारे चुनाव दर चुनाव भाजपा राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाकर राजनीतिक सफलता के नए-नए अध्याय रचती गयी। चूंकि राम मंदिर के प्रति उमड़े जनोंन्माद के पीछे आरक्षण के खात्मे के भावना की क्रियाशीलता ज्यादा थी तथा संघ खुद भी पूना पैक्ट के जमाने से आरक्षण के खात्मे की ताक में रहा, इसलिए राम मंदिर से मिली राजसत्ता का इस्तेमाल संघ प्रशिक्षित प्रधानमंत्रियों ने मुख्यतः आरक्षण के खात्मे में किया। इस मामले में प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ग- संघर्ष का एकतरफा खेल खेलते हुए बहुजनों को लगभग उस स्टेज में पहुंचा दिया है, जिस स्टेज में उन्हें रहने का निर्देश हिन्दू धर्म शास्त्र देते हैं।

उन्होंने राम के नाम पर मिली सत्ता का इस्तेमाल श्रम कानूनों को शिथिल करने, लाभजनक दर्जनों सरकारी कंपनियों , रेलवे, हवाई अड्डों,  बंदरगाहों , बस अड्डों ,हास्पिटलों इत्यादि को निजी हाथों में देने में किया, जहां सुलभ आरक्षण के जरिये इनके जीवन में सुखद बदलाव आ रहा था । इसके साथ ही उन्होंने सुपरिकल्पित रूप से उस संविधान को काफी हद तक व्यर्थ कर दिया है, जो हिन्दू कानूनों द्वारा दीन –हीन बनाये गए दलित, आदिवासी,पिछड़ों और महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ करने का मार्ग प्रशस्त करता है। बहरहाल ठीक से देखा जाए तो 25 नवम्बर, 2025 को राम मंदिर के पूर्णता के प्रतीक के तौर पर जो धर्म- ध्वजा फहराई गई, दरअसल वह सामाजिक न्याय के खिलाफ विजय के प्रतीक के स्वरूप फहराया गया है।

राम मंदिर आन्दोलन के सिलसिले में पिछले चार दशकों से साधु-संतों का संघर्ष असल में सामाजिक न्याय और आरक्षण के विस्तार के खिलाफ एक प्रतिक्रांति थी। इस प्रतिक्रांति के फलस्वरूप आज हिन्दू धर्म को हानि पहुँचाने वाला सामाजिक न्याय का आन्दोलन जमींदोज हो चुका है। मंडल के खिलाफ उठी प्रतिक्रांति के बाद आज बड़े-बड़े सामाजिक न्यायवादी नेता बिल में घुस चुके हैं और बाकी नेता संघ-भाजपा के शरणागत हो चुके हैं। राम मंदिर के जरिये मिली अपार राजनीतिक शक्ति के जोर से संघ-भाजपा इतना शक्तिशाली हो गए हैं कि 2047 तक आजादी के सौंवी वर्षगांठ तक हिन्दू धर्मारित समाज व्यवस्था लागू करने की स्थिति में आ जायेंगे। इसमें कोई शक नहीं कि राम मंदिर की पूर्णता एक बड़ी प्रतिक्रांति का परिणाम है, जिस दिन दैवीय- गुलाम बने दलित-पिछड़ों को इसका ठीक से इल्म होगा, वे सर्व-व्यापी आरक्षण के जोर से एक क्रांति को अंजाम देने का मन बनायेंगे! 

(लेखक एचएल दुसाध बहुजन डायवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

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